Monday, June 5, 2017

यादों के झरोखों से

मैं ढूंढता हूं जिसे वह जहां नहीं मिलता ,
नई जमीन नया आसमान नहीं मिलता ।

खड़ा हूं मैं कब से चेहरों के एक उपवन में ,
तुम्हारे चेहरे का यहाँ कुछ भी नहीं मिलता ।

नई जमीन नया आसमान भी मिल जाए ,
अपनों का यहाँ कहीं कुछ निशां नहीं मिलता ।

मगर हमें भी हैं यकीन तुमको ढूंढ पाने का ,
चाहें कुछ भी हो पाकर ही मुझे चैन मिलता ।



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