मैं ढूंढता हूं जिसे वह जहां नहीं मिलता ,
नई जमीन नया आसमान नहीं मिलता ।
खड़ा हूं मैं कब से चेहरों के एक उपवन में ,
तुम्हारे चेहरे का यहाँ कुछ भी नहीं मिलता ।
नई जमीन नया आसमान भी मिल जाए ,
अपनों का यहाँ कहीं कुछ निशां नहीं मिलता ।
मगर हमें भी हैं यकीन तुमको ढूंढ पाने का ,
चाहें कुछ भी हो पाकर ही मुझे चैन मिलता ।
नई जमीन नया आसमान नहीं मिलता ।
खड़ा हूं मैं कब से चेहरों के एक उपवन में ,
तुम्हारे चेहरे का यहाँ कुछ भी नहीं मिलता ।
नई जमीन नया आसमान भी मिल जाए ,
अपनों का यहाँ कहीं कुछ निशां नहीं मिलता ।
मगर हमें भी हैं यकीन तुमको ढूंढ पाने का ,
चाहें कुछ भी हो पाकर ही मुझे चैन मिलता ।

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